108 Shiva Temple

108 Shiva Temple
Bardhaman

History

History Of Temple

বর্ধমানরাজ তিলকচন্দের (মতান্তরে ত্রিলোকচন্দ) মৃত্যুর পর তাঁর পুত্র তেজচন্দ মাত্র ছয় বছর বয়সে বর্ধমানের সিংহাসনে অধিষ্ঠিত হন। রাজমাতা বিষণকুমারী দেবীর (বিষ্ণুকুমারী) অনুরোধে দিল্লির বাদশাহ শাহ আলম নাবালক তেজচন্দকে ‘রাজাধিরাজ’ হিসেবে স্বীকৃতি দিলেও তৎকালীন ইষ্ট ইণ্ডিয়া কোম্পানির গভর্নর ওয়ারেন হেস্টিংস শিশু-রাজাকে স্বীকৃতি দিলেন না। প্রবল প্রতিপত্তিশালী ওয়ারেন হেস্টিংস বন্ধু প্রধান বিচারপতি এলিজা ইম্পের সহযোগিতায় যে কোন অন্যায় কাজ করতে পিছ-পা হতেন না। দেবী সিং এবং রেজা খাঁ নামক তাঁর কর্মচারীদ্বয় জবরদস্তি পূর্বক কর আদায়ের কারনে শুরু হয় ছিয়াত্তরের মন্বন্তর। বর্ধমান শহরের নানা প্রান্ত, বিশেষ করে নবাব হাট এলাকায় দুই তৃতীয়াংশ মানুষ অনাহারে মৃত্যু বরণ করেন।

যে কোন প্রকারে বর্ধমানরাজের সম্পত্তি জবরদখল করাই ছিল হেস্টিংসের উদ্দেশ্য। এই অসৎ উদ্দেশ্যে লন্ডনের প্রিভি কাউন্সিলেও বিষণকুমারীদেবী আবেদন করেন এবং এই অসম আইনি যুদ্ধে জয়লাভ করেন। কথিত আছে, ওয়ারেন হেস্টিংসের মত প্রবল পরাক্রমশালী গভর্নরের বিরুদ্ধে মামলায় অসহায় বিধবা বিষণকুমারী জয়লাভের জন্য দেবাদিদেব মহাদেবের কাছে বর প্রার্থনা করেন, ‘আমি যদি এই অসম যুদ্ধে জয়লাভ করি দেবাদিদেবের জন্য একশত আটটি শিবমন্দির নির্মাণ করে দেব।” তাঁর ইচ্ছাপুরণ হয়।

শিশু তেজচন্দের হয়ে তিনি যেমন বর্ধমানের দায়িত্ব পান অন্যদিকে হেস্টিংসের ইমপিচমেন্ট হয়। বলা বাহুল্য মহারাজ নন্দকুমারের ফাঁসি দিতে পারলেও শিবের আশীর্বাদধন্য বিষণকুমারীর কোন ক্ষতি করতে পারেননি হেস্টিংস। জয়লাভের পর, ইংরেজি ১৭৮৯ খ্রিষ্টাব্দে, বিষণকুমারী তার প্রতিজ্ঞা রক্ষা করে বর্ধমান নবাবহাটে মহাদেবের ১০৮ টি (উল্লেখিত শ্লোক অনুযায়ী মন্দিরের সংখ্যা ১০৯) এবং অম্বিকা-কালনায় ১০৮টি শিবমন্দির নির্মাণ করেন। মন্দির প্রতিষ্ঠায় দেশ-বিদেশ থেকে লক্ষাধিক ব্রাহ্মণকে সাদরে আমন্ত্রণ জানিয়ে তাঁদের পাদোদক একটি পাত্রে সংরক্ষিত রাখা হয় রাজবাড়ীতে।

শুধু ইতিহাসের দিকে নয়, ঐশী মাহাত্মা, অনুপম স্থাপত্য, লোকায়ত-অলৌকিক বিশ্বাস, নির্মাণ কৌশলে বর্গক্ষেত্রের জ্যামিতিক বিন্যাস, অসামান্য পরিবেশ, পর্যটন সব মিলিয়ে বর্ধমানের ১০৮ শিবমন্দির লক্ষ লক্ষ ভক্ত এবং পর্যটকের কাছে অনুপম আকর্ষণ। উল্লেখ্য, ১০৯টি শিবলিঙ্গের প্রত্যেকটি স্বতন্ত্র নামে অভিহিত।

আজ থেকে দুশো পঁয়ত্রিশ বছর আগে নির্মিত অনিন্দ্যসুন্দর এই মন্দিরশৈলীকে ঘিরে প্রতিবছর শিবারাত্রিতে মেলার আয়োজন করা হয়। বর্ধমানের অন্যতম প্রাচীন ও ঐতিহ্যশালী এই মেলা জাতি ধর্ম নির্বিশেষে সকল মানুষের মিলননোৎসব।

নিবেদন ইতি
১০৮ শিব মন্দির ট্রাস্ট, বর্ধমান।

History

History Of Temple

सन १७७९ में जब तेजचन्द्र १६ बर्ष के हुए तब बिष्णुकुमारी हिन्दु प्रथा के अनुसार अपने पुत्र को राज्य का उत्तराधिकार सौंपा। राज्य का उत्तराधिकार अपने पुत्र को सौंपने के बाद महारानी बिष्णुकुमारी सात वर्षो तक शिव मन्दिर के निर्माण में निमग्न हो गयी। सन १७८४ में महारानी ने कालना में पवित्र गंगा के किनारे रामेश्वर शिव मन्दिर का निर्माण करवाया और उन मन्दिरों में काले तथा साढ़े पत्थरों के शिवलिंग स्थापित किये गये पाप-पुण्य के प्रतीक है। यह मन्दिर महारानी की कल्पना के अनुसार बंगाल की स्थापत्य कला के अनुरूप आटचाला की भाँति चतुष्कोण में स्थापित हुआ। जपमाला के आकार की तरह ठीक उसी प्रकार मन्दिर का निर्माण हुआ जैसे माला में १०८ मणियाँ होती हैं तथा अलग से एक सुमेरू होता है। हिन्दुओं में १०८ संरब्या का एक इन्द्रजालिका प्रभाव भी है। 

हिन्दु धर्म ग्रन्थों में भी १०८ संख्या की बिशेष महत्वपुर्ण व्याख्या हुई है। कुछ भी हो, रानी बिष्णुकुमारी बालेश्वर के मन्दिर के आटचाला के अनुरूप ही बर्धमान के नबाब हाट में १०८ शिव मन्दिर की स्थापना दुध की तरह सफेद आटचाला के नक्षानुमा १०८ मन्दिरों में काले पथ्थरों के शिबलिंग स्थापित करवायीं जो देखने में वर्धमान १०८ शिवमन्दिर मणियों का द्वार जैसा लगता है। मन्दिर के बाहर की दीवारें एक दुसरे से जुड़ी हुई हैं। मन्दिर के सभी दरवाजे भीतर की ओर खुलते है। मन्दिरों के सामने खुला लम्बा बरमदा तथा बरामदे के नीचे बँधाया गया रास्ता है। प्रत्येक मन्दिर का आयतन १० x १० फुट एवं ऊँचाई लगभग१५ फुट है। बंगाल की स्थापत्य कला का टेराकोटा शिव मन्दिर में नहीं है। सभी मन्दिर एक ही जैसे निर्मित है। इस आयताकार मन्दिर का प्रवेशद्वार पश्चिम की ओर है। पूर्व की ओर आयतक्षेत्र से अलग एक छोटा अर्थात् १०९ बाँ मन्दिर निर्मित है जो जपमाला के सुमेरू की कल्पना के अनुसार की गयी है। आयताकार मन्दिर के अन्दर छायादार सघन वृक्षों से आच्छादित बगीचा भी लगाया गया है। मैदान के अधिकांश स्थानों को लेकर दो पुष्करणियों की खुदाई भी की गयी है जिनमें पुण्यार्थी पुण्य के पूर्व स्नान कर, पवित्र हृदय से पुजा कर देब-दर्शन में निमग्न ही सकें। महारानी बिष्णुकुमारी का बिश्वास था कि प्रथम मन्दिर से होकर शेष मन्दिर तक परिक्रमा करना १०८ बार मंत्रोच्चारण की अपेक्षा अधिक फलदायक है। प्रतिवर्ष शिवचतुर्दशी (शिवरात्रि) में यहाँ बिशाल उत्सव और मेला भी अनुष्ठित होता है। बर्धमान शहर के अलाबा आस-पास के गाँव से भी उक्त अवसर पर भक्त शिव पुजा और जलधारा के लिए आते है। उस अबसर पर कई दिनों तक मेला लगा रहता है। बिगत कुछ दिनों से सावन के महीने में भी मन्दिर में भत्को की भीड़ देखी जा रही है। बर्धमान के अलावा कोलकाता से भी भक्त अपनी निजी गाड़ी और बसों से यहाँ पूजा और शिव आराधना के लिए आते है।

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